नई दिल्ली। राष्ट्रपति और राज्यपाल द्वारा बिलों की मंजूरी में देरी के मुद्दे पर दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट आज (20 नवंबर) महत्वपूर्ण फैसला सुनाएगा। कोर्ट ने इससे पहले 11 सितंबर को सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रखा था।
सुनवाई के दौरान CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति बी.आर. गवई की बेंच ने तीखी टिप्पणियां करते हुए कहा था कि लोकतंत्र में कोई भी संवैधानिक पद कानून से ऊपर नहीं है। अगर गवर्नर लंबे समय तक बिलों को रोककर रखें, तो अदालत चुप नहीं बैठ सकती।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया था कि अदालत गवर्नर को यह आदेश नहीं दे सकती कि वे कैसे निर्णय लें। इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा—अदालत यह तो नहीं बता सकती कि गवर्नर क्या निर्णय लें, लेकिन इतना जरूर कह सकती है कि निर्णय लिया जाए।
अब पूरे देश की नजर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर टिकी है, जो भविष्य में संवैधानिक प्रक्रिया की समयबद्धता को तय करने में अहम साबित हो सकता है।

