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तरबूज: गर्मी में ठंडक और कमाई दोनों का ज़रिया, किसानों के लिए बना वरदान

तरबूज: गर्मी में ठंडक और कमाई दोनों का ज़रिया, किसानों के लिए बना वरदान
— अजीत विलियम्स, वैज्ञानिक (वानिकी), बीटीसी कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर

बिलासपुर। गर्मी के मौसम में जब लू का प्रकोप बढ़ जाता है, तब राहत देने वाले फलों में सबसे पहले नाम आता है तरबूज का। लेकिन यह केवल एक स्वादिष्ट और ठंडक देने वाला फल नहीं, बल्कि पोषण और खेती के लिहाज से भी बेहद लाभकारी है। तरबूज में मौजूद उच्च जल मात्रा, विटामिन्स, एंटीऑक्सीडेंट्स और खनिज इसे सेहत के लिए संजीवनी बना देते हैं, वहीं वैज्ञानिक तकनीकों से इसकी खेती कर किसान अपनी आय को दोगुना तक कर सकते हैं।

पोषण का खजाना है तरबूज
तरबूज में 90-92 प्रतिशत पानी होता है, जो शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद करता है। इसमें लाइकोपीन नामक एंटीऑक्सीडेंट पाया जाता है, जो हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभकारी और कैंसर की संभावना को कम करता है। विटामिन C, पोटैशियम और फाइबर भी इसमें भरपूर मात्रा में होते हैं, जो रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, त्वचा व बालों को स्वस्थ रखने और पाचन क्रिया को बेहतर करने में सहायक हैं।

औषधीय गुणों से भरपूर
तरबूज शरीर को लू और डिहाइड्रेशन से बचाता है। इसके नियमित सेवन से त्वचा में निखार आता है और बाल मजबूत होते हैं। पोटैशियम और लाइकोपीन की संतुलित मात्रा हृदय की कार्यप्रणाली को भी सुचारू बनाए रखती है।

वैज्ञानिक खेती से बढ़ेगी आय
तरबूज की खेती के लिए 25-35 डिग्री सेल्सियस तापमान और बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है। फरवरी-मार्च में इसकी बुवाई कर अप्रैल-जून तक फसल तैयार हो जाती है। टपक सिंचाई प्रणाली और जैविक खादों के उपयोग से लागत कम की जा सकती है।

प्रमुख किस्मों में 'सुगंधा', 'अर्जुन' और 'नमधारी 108' किसानों में लोकप्रिय हैं। बीजों का जैविक फफूंदनाशकों से उपचार भी जरूरी होता है।

बाजार में भारी मांग, बेहतर कमाई
गर्मी में तरबूज की मांग सबसे अधिक रहती है। यदि किसान सही समय पर उत्पादन कर उचित विपणन रणनीति अपनाएं तो उन्हें प्रति हेक्टेयर 60-80 टन तक उपज और ₹10 से ₹30 प्रति किलोग्राम की दर से अच्छी आमदनी हो सकती है। ठेके पर खेती कर किसान कंपनियों से सीधा जुड़कर स्थायी आमदनी भी सुनिश्चित कर सकते हैं।

जलवायु परिवर्तन के दौर में संभावनाओं की फसल
सूखा-सहिष्णु फसल होने के कारण तरबूज जलवायु परिवर्तन के इस दौर में एक प्रभावी विकल्प बनकर उभरा है। इसे कृषि वानिकी मॉडल के तहत नीम, करंज, आम जैसे वृक्षों के साथ भी उगाया जा सकता है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता और किसान की आय दोनों में सुधार होता है।

निष्कर्ष
तरबूज सिर्फ एक फल नहीं, बल्कि किसानों के लिए आर्थिक समृद्धि का माध्यम बन सकता है। वैज्ञानिक विधियों को अपनाकर इसकी खेती से न केवल उपज बढ़ाई जा सकती है, बल्कि जलवायु परिवर्तन की चुनौती से भी निपटा जा सकता है। सतत कृषि की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।


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