भारत का गौरव बना "जारूल", मिट्टी संरक्षण से लेकर औषधीय गुणों तक है खास
– अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ एग्री एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर
बिलासपुर। गर्मियों में खिलते शानदार फूलों से सजे जारूल के पेड़ अब सिर्फ सुंदरता ही नहीं, बल्कि पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों में अहम भूमिका निभा रहे हैं। "प्राइड ऑफ इंडिया" के खिताब से नवाजे गए इस वृक्ष को अब छत्तीसगढ़ में भी बड़े स्तर पर लगाने की योजना बनाई जा रही है। वन विभाग की रोपणियों और निजी नर्सरियों में इसके पौधों की मांग तेजी से बढ़ रही है।
जारूल की घनी और मजबूत जड़ प्रणाली इसे मिट्टी के कटाव को रोकने में सक्षम बनाती है, जिससे यह बिगड़े वनों को पुनर्जीवित करने में मदद करता है। यही कारण है कि महानीम और गोल्डन शॉवर ट्री के बाद अब इसे भी रोडसाइड पौधरोपण की वृहद योजना में शामिल किया जा रहा है।
इस पेड़ के चमकीले फूल मधुमक्खियों, तितलियों और पक्षियों को आकर्षित करते हैं। साल में दो बार फूल देने वाला यह वृक्ष अब एवेन्यू-ट्री और ट्री-फार्मिंग में भी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।
औषधीय दृष्टि से भी जारूल अत्यंत मूल्यवान है। इसकी जड़ें पेट दर्द व दस्त में राहत देती हैं, वहीं छाल और पत्तियां कब्ज से छुटकारा दिलाती हैं। पत्तियों का काढ़ा मूत्र विकार, रक्तचाप, कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड के नियंत्रण में उपयोगी माना जाता है। यही नहीं, इसकी पत्तियों से बनी चाय शरीर को डिटॉक्सीफाई करने और लीवर की सुरक्षा में सहायक है।
महाराष्ट्र ने जारूल के इन्हीं गुणों के कारण इसे राजकीय वृक्ष घोषित किया है। अब छत्तीसगढ़ में भी इसकी उपयोगिता को समझते हुए बड़े पैमाने पर इसे लगाने की तैयारी शुरू हो चुकी है।
जारूल, न केवल एक सुंदर वृक्ष, बल्कि भारत के गौरव का प्रतीक बन चुका है – पर्यावरण संरक्षण और आयुर्वेदिक चिकित्सा में इसकी उपयोगिता इसे और भी खास बनाती है।
