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छत्तीसगढ़ में मानव-हाथी द्वंद्व बना गंभीर संकट, समाधान के लिए व्यापक रणनीति की जरूरत

छत्तीसगढ़ में मानव-हाथी द्वंद्व बना गंभीर संकट, समाधान के लिए व्यापक रणनीति की जरूरत

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में मानव-हाथी द्वंद्व विकराल रूप ले चुका है। खासकर रायगढ़, कोरबा, मरवाही, सरगुजा, जशपुर, बलरामपुर और महासमुंद जिलों में इस संघर्ष की घटनाएँ तेजी से बढ़ रही हैं। वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों में कमी, जल और भोजन की समस्या तथा बढ़ती मानव गतिविधियाँ इसके प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।

कारण और प्रभाव

खनन, कृषि विस्तार और अवैध अतिक्रमण से हाथियों के प्राकृतिक गलियारे बाधित हो गए हैं, जिससे वे भोजन और पानी की तलाश में बस्तियों की ओर बढ़ रहे हैं। फसल नष्ट करने और जल स्रोतों पर कब्जे के चलते यह संघर्ष और तीव्र हो गया है। महुआ और अवैध शराब की गंध भी हाथियों को मानव बस्तियों की ओर आकर्षित कर रही है।

इस संघर्ष में हर साल कई लोगों की जान जाती है, वहीं, हाथियों को भी प्रतिशोध का शिकार बनना पड़ता है। किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है, जबकि सरकार को मुआवजा देने में भारी खर्च करना पड़ता है।

संभावित समाधान

विशेषज्ञों के अनुसार, इस समस्या के समाधान के लिए समग्र रणनीति की जरूरत है।

  • हाथी गलियारों की पुनर्बहाली से उनका मार्ग सुगम बनाया जा सकता है।
  • फसल सुरक्षा उपायों में मधुमक्खी पालन, मिर्ची रस्सी और सौर चालित बाड़ का उपयोग प्रभावी हो सकता है।
  • वैकल्पिक फसलें, जैसे लेमन ग्रास, जिरेनियम और अदरक, हाथियों के आकर्षण को कम कर सकती हैं।
  • तकनीकी समाधान, जैसे जीपीएस ट्रैकिंग और ड्रोन निगरानी, हाथियों की गतिविधियों पर नज़र रखने में मदद कर सकते हैं।

वन विभाग, स्थानीय प्रशासन और समुदायों के बीच समन्वय स्थापित कर इस चुनौती से निपटने के प्रयास किए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि दीर्घकालिक नीतियों और वैज्ञानिक प्रबंधन से इस समस्या को नियंत्रित किया जा सकता है।

- अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर

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