बिलासपुर। मानसून का मौसम केवल धान और अन्य खरीफ फसलों का ही नहीं, बल्कि अनेक देशी एवं पौष्टिक सब्जियों का भी मौसम होता है। इन्हीं में एक महत्वपूर्ण सब्जी है कंटोला (ककोड़ा), जिसे भारत के विभिन्न क्षेत्रों में ककोड़ा, करटोली, काकरोल, कंटोली और स्पाइनी गॉर्ड जैसे नामों से जाना जाता है। आकार में छोटा, हरे रंग का तथा मुलायम कांटों से ढका यह फल स्वाद, पोषण और औषधीय गुणों का अनूठा संगम है।
आज जब जलवायु परिवर्तन, अनियमित मानसून और पोषण असंतुलन जैसी चुनौतियाँ सामने हैं, तब कंटोला जैसी पारंपरिक सब्जियाँ एक बार फिर चर्चा में हैं। यह न केवल परिवार के भोजन को पौष्टिक बनाती है, बल्कि छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए अतिरिक्त आय का अच्छा स्रोत भी सिद्ध हो सकती है।
देशी सब्जी, आधुनिक पोषण का आधार
कंटोला कुकुर्बिटेसी कुल का बहुवर्षीय पौधा है। इसकी लताएँ सहारे के साथ तेजी से बढ़ती हैं और वर्षा ऋतु में भरपूर फल देती हैं। भारत के अधिकांश राज्यों में यह प्राकृतिक रूप से उगती है तथा अब इसकी व्यावसायिक खेती भी बढ़ रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार कंटोला में विटामिन-ए, विटामिन-सी, आयरन, कैल्शियम, पोटैशियम, फॉस्फोरस तथा पर्याप्त मात्रा में आहार रेशा पाया जाता है। यही कारण है कि इसे मानसून की सबसे पौष्टिक सब्जियों में गिना जाता है।
नियमित एवं संतुलित मात्रा में कंटोला का सेवन कई प्रकार से लाभ पहुंचा सकता है—
- रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने में सहायक।
- पाचन क्रिया को बेहतर बनाता है।
- कब्ज जैसी समस्याओं में राहत देता है।
- एंटीऑक्सीडेंट गुण शरीर को कोशिकीय क्षति से बचाने में मदद करते हैं।
- हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है।
- वजन नियंत्रित रखने वाले भोजन में उपयोगी।
- आंखों और त्वचा के स्वास्थ्य के लिए लाभदायक।
भारतीय रसोई में कंटोला का स्वाद
भारत की विविध खाद्य परंपराओं में कंटोला का विशेष स्थान है। गुजरात में मसालेदार सूखी सब्जी और मूंगफली के साथ। महाराष्ट्र में करटोली की पारंपरिक भाजी। पश्चिम बंगाल में काकरोल भजा।ओडिशा में दालमा एवं मिश्रित सब्जियों में। राजस्थान में भरवां कंटोला। मध्य भारत और छत्तीसगढ़ में लहसुन, धनिया तथा स्थानीय मसालों के साथ तैयार सूखी सब्जी विशेष रूप से पसंद की जाती है।
छत्तीसगढ़ के लिए क्यों महत्वपूर्ण है कंटोला?
छत्तीसगढ़ में वर्षा ऋतु के दौरान ग्रामीण हाट-बाजारों में कंटोला आसानी से उपलब्ध हो जाता है। बाड़ी (किचन गार्डन), खेत की मेड़ों तथा कृषि वानिकी प्रणालियों में इसकी खेती की अच्छी संभावनाएँ हैं।
यदि किसान इसे व्यवस्थित रूप से मचान (ट्रेलिस) प्रणाली पर उगाएँ तो कम क्षेत्र से भी बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। जैविक खेती अपनाने वाले किसानों के लिए भी यह उपयुक्त विकल्प है।
इसके अतिरिक्त स्थानीय स्तर पर इसकी बढ़ती मांग किसानों को बेहतर मूल्य दिला सकती है।
जलवायु परिवर्तन के दौर में नई उम्मीद
आज मानसून पहले जैसा नहीं रहा। कभी लंबे समय तक वर्षा नहीं होती, तो कभी कुछ ही घंटों में अत्यधिक बारिश हो जाती है। ऐसी परिस्थितियों में स्थानीय जलवायु के अनुकूल फसलों का महत्व बढ़ जाता है।
कंटोला की विशेषता है कि यह मानसूनी परिस्थितियों में अच्छी वृद्धि करता है तथा उचित जल निकासी वाली भूमि में बेहतर उत्पादन देता है। इसलिए यह विविधीकृत खेती का अच्छा विकल्प बन सकता है।
पोषण सुरक्षा में अहम भूमिका
भारत में आज भी सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी एक गंभीर चुनौती है। केवल पेट भरना पर्याप्त नहीं, बल्कि संतुलित पोषण भी आवश्यक है।
कंटोला जैसी देशी सब्जियाँ विटामिन, खनिज एवं प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट का अच्छा स्रोत हैं। यदि इन्हें नियमित भोजन का हिस्सा बनाया जाए तो परिवार के पोषण स्तर में उल्लेखनीय सुधार हो सकता है।
किसानों के लिए सुझाव
- वर्षा प्रारंभ होने पर रोपण करें।
- अच्छी जल निकासी वाली भूमि का चयन करें।
- मचान प्रणाली अपनाने से फल की गुणवत्ता एवं उत्पादन बढ़ता है।
- गोबर की खाद, वर्मी कम्पोस्ट तथा जैव उर्वरकों का उपयोग करें।
- मधुमक्खियों जैसे परागणकर्ताओं का संरक्षण करें।
- स्थानीय बाजार के साथ-साथ प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन पर भी ध्यान दें।
कंटोला केवल एक मौसमी सब्जी नहीं, बल्कि भारतीय कृषि परंपरा, पोषण सुरक्षा और टिकाऊ खेती का जीवंत प्रतीक है। बदलती जलवायु, बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं और प्राकृतिक खेती की ओर लौटते रुझान के बीच यह देशी सब्जी नए अवसरों का द्वार खोल रही है। यदि किसान इसकी वैज्ञानिक खेती अपनाएँ और उपभोक्ता इसे अपने भोजन में नियमित स्थान दें, तो यह "मानसून का ग्रीन सुपरफूड" वास्तव में स्वास्थ्य, पर्यावरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था—तीनों के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकता है।
पोषण, जैव विविधता और किसानों की आय का सशक्त आधार
जलवायु परिवर्तन के वर्तमान दौर में स्थानीय, पौष्टिक एवं कम लागत वाली सब्जियों का महत्व तेजी से बढ़ रहा है। कंटोला ऐसी ही एक महत्वपूर्ण फसल है, जो पोषण सुरक्षा, कृषि जैव विविधता तथा किसानों की अतिरिक्त आय के स्रोतों को सुदृढ़ करने की क्षमता रखती है। इसकी खेती अपेक्षाकृत कम लागत में की जा सकती है और यह विविध कृषि परिस्थितियों में भी अच्छा उत्पादन देने में सक्षम है। यदि कंटोला को कृषि वानिकी, गृहवाटिका तथा विविधीकृत खेती प्रणालियों में समुचित स्थान दिया जाए, तो यह ग्रामीण आजीविका को सशक्त बनाने के साथ-साथ जलवायु-अनुकूल एवं टिकाऊ कृषि प्रणाली के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।
अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर
