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कसई (Briedelia retusa): छत्तीसगढ़ के पारिस्थितिकी तंत्र का संकटग्रस्त प्रहरी

कसई (Briedelia retusa): छत्तीसगढ़ के पारिस्थितिकी तंत्र का संकटग्रस्त प्रहरी


प्राकृतिक आवास, औषधीय गुण और पारिस्थितिकी में भूमिका

बिलासपुर - कसई (Briedelia retusa) एक बहुमूल्य पर्णपाती वृक्ष प्रजाति है, जो मुख्यतः छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा, बीजापुर, नारायणपुर, सरगुजा, कोरिया, जांजगीर और गौरेला-पेंड्रा-मरवाही के वनों में पाई जाती है। यह वृक्ष मधुमक्खियों के लिए प्रमुख पराग स्रोत है, जबकि इसकी घनी शाखाएं पक्षियों को प्राकृतिक आवास प्रदान करती हैं।

इस वृक्ष की छाल में टैनिन की प्रचुर मात्रा पाई जाती है, जिसका उपयोग चमड़ा उद्योग में होता है। इसके अतिरिक्त छाल, पत्तियाँ और फल परंपरागत चिकित्सा पद्धतियों में बुखार, दस्त और मधुमेह जैसी बीमारियों के उपचार में प्रयुक्त होते हैं। नई कोपलें पशु चारे के रूप में सहायक होती हैं और घना झाड़नुमा स्वरूप प्राकृतिक बाड़ की भूमिका निभाता है।

तेजी से घटती उपस्थिति और प्रमुख कारण

वर्तमान समय में कसई वृक्ष की उपस्थिति छत्तीसगढ़ में तेजी से घट रही है। अन्य जिलों में यह लगभग विलुप्तप्राय स्थिति में है। इसका मुख्य कारण विकास के नाम पर अवैध एवं अनियंत्रित वृक्ष कटाई है, जिससे इसके प्राकृतिक आवासों का लगातार क्षरण हो रहा है।

विशेष जानकारी: कसई क्यों है अहम?

औषधीय उपयोग

छाल: बुखार, दस्त और मधुमेह के उपचार में

पत्तियाँ और फल: आयुर्वेदिक औषधियों में

टैनिन: चमड़ा उद्योग में उपयोग

पारिस्थितिकी महत्व

- मधुमक्खियों के लिए पराग स्रोत
- पक्षियों को घनेपन के कारण प्राकृतिक आश्रय
- उच्च तापमान सहन करने की क्षमता
- मृदा अपरदन को रोकने में सहायक

पशुधन और खेती में उपयोग

- कोपलें: पशु चारे के रूप में
- झाड़ीदार बनावट: प्राकृतिक बाड़बंदी हेतु

संरक्षण की आवश्यकता

वानिकी वैज्ञानिकों का मानना है कि कसई की तेजी से घटती संख्या चिंता का विषय है। यदि शीघ्र प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो यह प्रजाति पारिस्थितिक संतुलन से बाहर हो सकती है। इसलिए सुझाव दिए गए हैं कि:
- नर्सरी आधारित पौधारोपण कार्यक्रमों में कसई को प्राथमिकता दी जाए।
- राज्य स्तरीय वानिकी योजनाओं और कृषि वानिकी मॉडल में इसका समावेश हो।
- स्थानीय समुदायों को प्रशिक्षण देकर संरक्षण में भागीदार बनाया जाए।

पारिस्थितिकीय संतुलन की रीढ़

कसई जैसे स्थानीय वृक्षों की भूमिका केवल पारिस्थितिकी तक सीमित नहीं है, यह ग्रामीण जीवन, परंपरागत ज्ञान और जलवायु परिवर्तन से लड़ने की हमारी क्षमता को भी सशक्त बनाते हैं। ऐसे में इसके संरक्षण, पुनर्स्थापन और प्रचार-प्रसार की दिशा में ठोस कार्यनीति की आवश्यकता है।

कसई वृक्ष एक ऐसा अदृश्य रक्षक है, जो वनों, वन्यजीवों, ग्रामीणों और हमारे भविष्य को जोड़ता है। इसकी रक्षा के बिना पारिस्थितिकी सुरक्षा की कल्पना अधूरी है। अतः यह समय है कि हम इसके महत्व को पहचानें और आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे सहेजें।

अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर

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