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रत्ती अब रत्ती भर नहीं, दवाओं ने बचा ली है पहचान ...संधिवात, सिरदर्द, त्वचा रोग, कृमि और ज्वर में है असरदार

रत्ती अब रत्ती भर नहीं, दवाओं ने बचा ली है पहचान
संधिवात, सिरदर्द, त्वचा रोग, कृमि और ज्वर में है असरदार

सतीश अग्रवाल, बिलासपुर
कभी आभूषणों के मापन की अहम इकाई रहा ‘रत्ती’ अब इतिहास बनने की कगार पर है। माप विज्ञान की नई व्यवस्था में ‘रत्ती’ को मिलीग्राम से बदल दिया गया है। इसके चलते जहां एक ओर सराफा बाजार से रत्ती गायब हो गया है, वहीं दूसरी ओर यह पौधा भी धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर बढ़ रहा है।

विषैला होने के कारण इसके संरक्षण और संवर्धन की दिशा में खास प्रयास नहीं हो पा रहे हैं, लेकिन आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सा पद्धतियों में यह अब भी प्रभावशाली औषधीय पौधे के रूप में अपनी अहम पहचान बनाए हुए है।

इसलिए 'रत्ती भर' नहीं रहा

आभूषण विक्रेताओं द्वारा सदियों से प्रयुक्त रत्ती अब डिजिटल युग की सटीक मापन तकनीकों के आगे टिक नहीं पाया। डिजिटल वेइंग मशीनों की आमद और माप विज्ञान विभाग से मान्यता नहीं मिलने के चलते इसे माप इकाई से बाहर कर दिया गया। अब इसकी जगह मिलीग्राम ने ले ली है, जिससे उपभोक्ता और व्यापारी त्रुटिरहित मापन को प्राथमिकता दे रहे हैं।

औषधीय क्षेत्र में अब भी सक्रिय

भले ही रत्ती का उपयोग आभूषण व्यापार से खत्म हो गया हो, लेकिन औषधीय क्षेत्र में इसकी मांग अब भी बरकरार है। आयुर्वेदिक और यूनानी दवा निर्माता इकाइयों में रत्ती की जड़, पत्तियां और बीज संधिवात, सिरदर्द, त्वचा रोग, कृमिनाशक और ज्वरनाशक औषधियों के निर्माण में उपयोग हो रही हैं। हालांकि विषैले तत्वों की मौजूदगी के कारण इन इकाइयों को भंडारण और प्रयोग में अत्यधिक सावधानी बरतनी पड़ती है।

जानिए कैसा होता है रत्ती का पौधा

रत्ती एक लतावर्गीय पौधा है, जो उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगता है। इसकी पत्तियां युग्मपर्ण होती हैं, जबकि फूल छोटे और गुलाबी या बैंगनी रंग के होते हैं। इसके बीज लाल रंग के होते हैं, जिनके एक छोर पर काला धब्बा होता है। रत्ती का पौधा विषैला होने के साथ-साथ औषधीय गुणों से भरपूर होता है। यही द्वैध प्रकृति इसे विशिष्ट बनाती है।

वर्जन: अद्भुत वनस्पति

अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर
“रत्ती एक द्वैध प्रकृति वाला पौधा है – जहाँ एक ओर इसके बीज अत्यंत विषैले हैं, वहीं दूसरी ओर इसमें औषधीय गुण भी प्रचुर मात्रा में हैं। दुर्भाग्यवश इसके विषैले स्वरूप ने इसे उपेक्षित कर दिया है। संरक्षण और संवर्धन के अभाव में यह प्रजाति स्थानीय स्तर पर लुप्त होती जा रही है। हमें इसके सुरक्षित औषधीय उपयोग और नियंत्रित संवर्धन की दिशा में अनुसंधान और जागरूकता दोनों को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि जैव विविधता संतुलित रह सके।”

यह अद्भुत वनस्पति न केवल हमारे पारंपरिक ज्ञान का हिस्सा है, बल्कि भविष्य में औषधीय अनुसंधान के लिए भी महत्वपूर्ण आधार बन सकती है।

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