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नीम, बन रहा ग्लोबल ट्रीप्वाइंटर- दुनिया के बारह देशों ने दी मंजूरी

 नीम, बन रहा ग्लोबल ट्री

दुनिया के बारह देशों ने दी मंजूरी, रोपण की


बिलासपुर- अधिकतम 50 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम 0 डिग्री सेल्सियस तापमान पर बखूबी से पनपता है। यह बहुमुखी प्रतिभा केवल नीम के वृक्ष में ही होती है। अनुकूल या प्रतिकूल तापमान ही नहीं बल्कि किसी भी प्रकार की मिट्टी में बेहतर प्रदर्शन करने वाले नीम को अब ग्लोबल ट्री के नाम से जाना जा रहा है। 

समृद्ध आयुर्वेदिक परंपरा को आगे बढ़ाने वाला नीम, एक बार फिर से पौधरोपण के लिए तैयार हो रहा है क्योंकि रोपण के दिन करीब आ रहे हैं। रुझान के बाद संभावित मांग को ध्यान में रखते हुए इस बरस शासकीय और निजी नर्सरियों में बड़ी संख्या में पौधे तैयार किये जा रहे हैं। 

इसलिए माना ग्लोबल ट्री

नीम की पत्तियां, छाल, फल और बीज। यह चीजें हैं, जिनका उपयोग औषधि निर्माण इकाइयां करती हैं, तो महत्वपूर्ण कीटनाशक भी बनाए जाते हैं। मानव स्वास्थ्य का सजग प्रहरी माना जाता है क्योंकि पृथ्वी पर सबसे प्राचीन और सबसे व्यापक रूप में उपयोग की जाने वाली जड़ी-बूटियों में से एक है। ऐसे गुणों के सामने आने के बाद अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीम पर शोध शुरू हो चुका है। 


हर तापमान मंजूर

बहुमुखी प्रतिभा वाला नीम अधिक तापमान पर भी बेहतर तरीके से पनपता है। अधिकतम 50 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम 0 डिग्री सेल्सियस तापमान पर भी यह खुद को बचाए रखने में सक्षम है। दिलचस्प बात यह है कि नीम का रोपण किसी भी प्रकार की मिट्टी में किया जा सकता है लेकिन काली और अच्छी जल निकास वाली भूमि पर इसका प्रदर्शन बेहतर पाया गया है। 

बन रही वैश्विक पहचान

सऊदी अरब, यमन और फिलीपींस। यह तीन ऐसे देश हैं, जिन्होंने अपने देश में पौधरोपण की सूची में नीम को शामिल कर लिया है। इसके पहले थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया, श्रीलंका, बर्मा, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देश नीम को रोपण की सूची में शामिल कर चुके हैं। सीमित संख्या में रोपण की मंजूरी ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया में भी दी जा चुकी है। 



पत्तियों से लेकर बीज सभी है अत्यंत उपयोगी

शायद ही कोई ऐसा होगा जो नीम के पेड़ के बारे में नहीं जानता। नीम पर्यावरण के लिए जितना महत्वपूर्ण है उतना ही स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद होता है। नीम के पेड़ का हर हिस्सा स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभकारी होता है। हमारे देश में नीम का उपयोग सदियों से औषधीय रूप में और घरेलू उपाय के तौर होता चला आ रहा है। इसके गुणों के कारण इसे कल्पवृक्ष भी कहा जाता है।

अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर

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