बिलासपुर - हाल के वर्षों में देश के अनेक शहरों में सड़क किनारे लगे वृक्षों को रंग-बिरंगी एलईडी लाइटों से सजाने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। नगरों को आकर्षक बनाने और रात्रिकालीन सौंदर्य बढ़ाने के उद्देश्य से किए जाने वाले इस प्रयास को आमतौर पर विकास और आधुनिकता का प्रतीक माना जाता है। लेकिन एक वानिकी वैज्ञानिक के रूप में यह प्रश्न उठाना आवश्यक है कि क्या यह चमक-दमक हमारे वृक्षों और शहरी पारिस्थितिकी के लिए सुरक्षित भी है?
वृक्ष केवल हरित सजावट नहीं हैं। वे शहरों के प्राकृतिक एयर कंडीशनर, कार्बन भंडार, जैव विविधता के आश्रय स्थल और पर्यावरणीय संतुलन के आधार स्तंभ हैं। जब हम किसी वृक्ष पर लगातार कृत्रिम रोशनी डालते हैं, तब हम अनजाने में उसकी प्राकृतिक जैविक प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप कर रहे होते हैं।
वैज्ञानिक अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि वृक्षों में भी एक जैविक घड़ी होती है, जो दिन और रात के प्राकृतिक चक्र के अनुसार कार्य करती है। रात्रि के समय लगातार कृत्रिम प्रकाश मिलने से वृक्षों की सुप्तावस्था, पत्तियों के झड़ने का समय, नई कलियों का विकास और कई अन्य शारीरिक प्रक्रियाएँ प्रभावित हो सकती हैं। लंबे समय तक यह स्थिति वृक्षों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।
इसका प्रभाव केवल वृक्षों तक सीमित नहीं है। सड़क किनारे लगे वृक्ष अनेक पक्षियों, तितलियों, मधुमक्खियों और अन्य उपयोगी जीवों का निवास स्थान होते हैं। अत्यधिक प्रकाश पक्षियों के विश्राम और प्रजनन चक्र को प्रभावित करता है। वहीं रात्रिचर कीट कृत्रिम रोशनी की ओर आकर्षित होकर अपने प्राकृतिक व्यवहार से भटक जाते हैं, जिससे परागण जैसी महत्वपूर्ण पारिस्थितिक प्रक्रियाएँ प्रभावित हो सकती हैं।
एक अन्य गंभीर समस्या वृक्षों पर लाइट लगाने की तकनीक से जुड़ी है। कई स्थानों पर तारों को तनों और शाखाओं पर कसकर बांधा जाता है या कीलों का उपयोग किया जाता है। इससे वृक्ष की छाल को क्षति पहुँचती है और रोगजनक फफूंद तथा कीटों के प्रवेश का मार्ग खुल जाता है। यह वृक्षों के दीर्घकालिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में, जहाँ पहले से ही बढ़ते तापमान, घटते भूजल स्तर और शहरी हरित क्षेत्रों के संरक्षण की चुनौती मौजूद है, वहाँ वृक्षों को केवल सजावटी वस्तु के रूप में नहीं देखा जा सकता। नीम, पीपल, बरगद, अर्जुन, कदम्ब, गुलमोहर और करंज जैसे वृक्ष शहरी पर्यावरण की जीवनरेखा हैं। इनके संरक्षण को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
इसका अर्थ यह नहीं है कि शहरों का सौंदर्यीकरण नहीं होना चाहिए। आवश्यकता केवल दृष्टिकोण बदलने की है। वृक्षों पर सीधे लाइट लपेटने के बजाय जमीन से प्रकाश डालने वाली अपलाइट प्रणाली, सौर ऊर्जा आधारित प्रकाश व्यवस्था, कम तीव्रता वाली गर्म रंग की एलईडी तथा समयबद्ध प्रकाश व्यवस्था जैसे विकल्प अपनाए जा सकते हैं। इससे सौंदर्य भी बना रहेगा और वृक्षों की प्राकृतिक कार्यप्रणाली भी सुरक्षित रहेगी।
आज जब विश्व भर में प्रकृति आधारित- समाधान की चर्चा हो रही है, तब हमें यह समझना होगा कि विकास और पर्यावरण संरक्षण परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। शहरों की वास्तविक सुंदरता कृत्रिम रोशनी में नहीं, बल्कि स्वस्थ, हरे-भरे और जीवंत वृक्षों में निहित है।
वृक्ष जीवनदायिनी हरित अवसंरचना
वृक्ष शहरों की सजावट नहीं, बल्कि उनकी जीवनदायिनी हरित अवसंरचना हैं। सौंदर्यीकरण की किसी भी योजना में वृक्षों के स्वास्थ्य, जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। विकास तभी सार्थक है जब वह प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करे।
अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर
