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तीन-लेन हरियाली मॉडल: लू के खिलाफ प्रकृति की ढाल... शहरीकरण और औद्योगिकीकरण से बढ़ी गर्मी, बहु-स्तरीय पौधारोपण बना स्थायी समाधान

तीन-लेन हरियाली मॉडल: लू के खिलाफ प्रकृति की ढाल

शहरीकरण और औद्योगिकीकरण से बढ़ी गर्मी, बहु-स्तरीय पौधारोपण बना स्थायी समाधान

बिलासपुर—एक लेन नहीं, अब तीन लेन में करना होगा पौधारोपण। प्रजाति विशेष का ध्यान इसलिए रखना होगा क्योंकि हीट वेव के दिन दोगुने हो चुके हैं।

शहरी संरचना में तेजी से बदलाव और विकास के पर्याय माने जा रहे औद्योगिकीकरण की कीमत अब छत्तीसगढ़ बढ़ते तापमान और लू के बढ़ते दिनों के रूप में चुका रहा है। स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि अब रात के समय भी गर्म हवाओं (नाइट हीट) का खतरा महसूस किया जा रहा है।

इसलिए तीन लेन में रोपण

तेज धूप और हीट वेव से बचाव के पारंपरिक उपाय अब नाकाफी साबित हो रहे हैं। ऐसे में प्रकृति आधारित समाधान पर जोर बढ़ा है।

तीन-लेन हरियाली मॉडल के तहत—

- पहली लेन में ऊँचे वृक्ष (छायादार)
- दूसरी लेन में मध्यम ऊँचाई के पौधे
- तीसरी लेन में झाड़ियाँ और ग्राउंड कवर

यह संरचना अधिकतम छाया, तापमान नियंत्रण और स्थानीय स्तर पर ठंडा माइक्रो-क्लाइमेट बनाने में सहायक होगी।

औद्योगिक हरियाली पर फोकस

प्रदेश में तेजी से बढ़ती औद्योगिक इकाइयों और खनन गतिविधियों के कारण हरित क्षेत्र लगातार सिमट रहे हैं।

ऐसे में—
- औद्योगिक और खनन क्षेत्रों के आसपास
- 5 से 25 किलोमीटर की परिधि में

सघन ग्रीन बेल्ट विकसित करना अनिवार्य माना जा रहा है। इससे प्रदूषण नियंत्रण के साथ-साथ तापमान में कमी लाने में भी मदद मिलेगी।

बढ़ रहे हीट वेव के दिन

पहले जहां लू का असर सामान्यतः 10 से 15 दिनों तक सीमित रहता था, वहीं अब इसमें लगभग 10 दिनों की वृद्धि दर्ज की जा रही है।

कटते जंगल, बढ़ते उद्योग और कंक्रीट संरचनाओं के विस्तार ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। ऐसे में विशेषज्ञ अब प्रकृति आधारित उपायों को ही सबसे प्रभावी विकल्प मान रहे हैं।

हीट वेव स्थाई पर्यावरणीय चुनौती

हीट वेव अब केवल मौसमी समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह एक स्थायी पर्यावरणीय चुनौती बन चुकी है। इसके प्रभावी नियंत्रण के लिए तीन-लेन आधारित बहु-स्तरीय पौधरोपण मॉडल अपनाना अत्यंत आवश्यक है।

ऊँचे, मध्यम और झाड़ी स्तर के पौधों का वैज्ञानिक संयोजन अधिकतम छाया, तापमान नियंत्रण और सूक्ष्म जलवायु निर्माण में सहायक होगा। औद्योगिक एवं खनन क्षेत्रों के आसपास सघन ग्रीन बेल्ट विकसित करना अनिवार्य है, जिसमें स्थानीय और जलवायु सहनशील प्रजातियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

यदि इन उपायों को योजनाबद्ध तरीके से लागू किया जाए, तो बढ़ते तापमान और हीट वेव के प्रभाव को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।”

अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर

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