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बांस मिशन की राह भटकी, किसानों का घटा रुझान

बांस मिशन की राह भटकी, किसानों का घटा रुझान
प्रसंस्करण व बाज़ार व्यवस्था के अभाव ने रोकी प्रगति, नीति और ज़मीनी कार्य में तालमेल की दरकार

बिलासपुर। राष्ट्रीय बांस मिशन की शुरुआत किसानों को आत्मनिर्भर बनाने और बांस आधारित उद्योगों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई थी। लेकिन योजना की दिशा अब भटकती नजर आ रही है। विपणन, प्रसंस्करण और गुणवत्ता वाली प्रजातियों की कमी के चलते किसानों का इस मिशन से मोहभंग होने लगा है।

राज्य में बांस की खेती का रकबा साल दर साल घटता जा रहा है। किसानों का कहना है कि उत्पादन तो हो रहा है, लेकिन तैयार बांस को बाजार में उचित मूल्य नहीं मिल रहा। नतीजतन उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।

कमज़ोर प्रजातियां बनी बाधा
योजना के तहत अनुशंसित बम्बूस, बालकोवा और तुलदा जैसी प्रजातियां किसानों की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर रहीं। किसान बेहतर गुणवत्ता वाली कनक कैच प्रजाति की मांग कर रहे हैं, जो आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाई।

आदिवासी क्षेत्रों की अनदेखी
बांस मिशन अधिकतर गैर-वन क्षेत्रों तक सीमित रह गया, जबकि आदिवासी क्षेत्रों में इसकी अपार संभावनाएं थीं। इन क्षेत्रों में योजना का प्रभावी विस्तार न होने से व्यापक लाभ नहीं मिल सका।

प्रसंस्करण इकाइयों का अभाव
बांस से फर्नीचर, हस्तशिल्प, कागज, और यहां तक कि वस्त्र (कपड़े) भी बनाए जा रहे हैं, लेकिन राज्य में प्रसंस्करण इकाइयों की कमी किसानों के लिए सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है। उन्हें न तो उद्योगों की जानकारी समय पर मिल पाती है, न ही तैयार माल की खपत का कोई स्थायी माध्यम उपलब्ध है।

नीति में गंभीरता की जरूरत
बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर के फॉरेस्ट्री साइंटिस्ट अजीत विलियम्स का मानना है कि राष्ट्रीय बांस मिशन एक दूरदर्शी योजना है, लेकिन इसका लाभ तभी मिलेगा जब नीति निर्माण के साथ-साथ ज़मीनी क्रियान्वयन पर भी समान रूप से ध्यान दिया जाए।

उन्होंने कहा, “किसानों की ज़रूरत के अनुसार उच्च गुणवत्ता वाली प्रजातियों की आपूर्ति, स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना और मूल्य श्रृंखला के विकास से ही बांस मिशन को फिर से पटरी पर लाया जा सकता है।”

देश में फिलहाल 136 प्रजातियों के साथ बांस का वार्षिक उत्पादन 3.23 मिलियन टन तक पहुंच चुका है। ऐसे में छत्तीसगढ़ जैसे वन क्षेत्रीय राज्य के लिए यह एक सुनहरा अवसर हो सकता है, बशर्ते नीति और अमल में ठोस सुधार हो।

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