कल, 17/10/2024 को पेंड्रा के हनुमान मंदिर प्रांगण में स्वर्णकार महिलाओं ने धूमधाम से अजमेर जयंती मनाई। इस अवसर पर महिलाओं ने विशेष पूजा-अर्चना की और भजन संध्या का आयोजन किया।
समारोह में स्वर्णकार समाज की जिलाध्यक्ष रानी बृजेश सोनी, रानी राम लखन सोनी, पूजा सोनी, साधना राजेश सोनी, सीमा, कुसुम, प्रियंका संजय सोनी, सुनीता, सरिता, मीना, लता, पुष्पा, अंकित, रूपाली, भारती, आरती, राधा, पिंकी, फूल कली, मंजुला, वंदना, गायत्री, अनीता, सीमा, सुषमा, ज्योति, अनुसुइया, और सुमन सहित अनेक महिलाओं ने कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई।
पारंपरिक गीत और नृत्य प्रस्तुत किए गए, जो समुदाय के लिए एकजुटता और सांस्कृतिक धरोहर को प्रदर्शित करते हैं।
महिलाओं ने इस अवसर को विशेष बताते हुए कहा कि यह पर्व उन्हें अपनी परंपराओं और संस्कृति को संरक्षित करने की प्रेरणा देता है। आयोजकों ने सभी उपस्थित लोगों का आभार व्यक्त किया और भविष्य में ऐसे आयोजनों की निरंतरता का आश्वासन दिया।
राजस्थान में प्रसिद्ध अजमेर (जिसका प्राचीन नाम अज्मेरू था) का इतिहास भी महत्वपूर्ण है। यहाँ बसकर मेवाड़ की नींव रखने वाले महाराज अजमीढ़ जी, मैढ़क्षत्रिय स्वर्णकार समाज के आदि पुरुष माने जाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि महाराज अजमीढ़, महाराजा अजमीढ़ जी के पिता का श्रीहस्ति थे, जिन्होंने महाभारत काल में वर्णित हस्तिनापुर नगर को बसाया था।
महाराजा हस्ती के जीवनकाल की प्रमुख घटना यही मानी जाती है कि उन्होंने हस्तिनापुर का निर्माण करवाया। प्राचीन समय में हस्तिनापुर तीर्थ स्थल और देश का प्रमुख राजनीतिक एवं सामाजिक केंद्र रहा।
महाराजा अजमीढ़ देव जी धर्म-कर्म में विश्वास रखते थे, और उन्हें खिलौने तथा आभूषण बनाने का बेहद शौक था। उनके वंशजों ने इसी शौक को व्यवसाय के रूप में आगे बढ़ाया। तब से स्वर्णकार समाज आभूषण बनाने के लिए जाना जाता है।
अजमीढ़ देव जी एक महान क्षत्रिय राजा थे। शरद पूर्णिमा (आश्विन शुक्ला 15) को मैढ़ क्षत्रिय स्वर्णकार समाज द्वारा उनकी जयंती मनाने की परंपरा है। वे ब्रह्मा द्वारा उत्पन्न अत्री की 28वीं पीढ़ी में त्रेता युग में जन्मे और मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम के समकालीन थे।
